रांची में वायु प्रदूषण का स्तर लगातार गंभीर होता जा रहा है। झारखंड की राजधानी, जो कभी अपनी स्वच्छ हवा और हरियाली के लिए जानी जाती थी, अब प्रदूषण के संकट से जूझ रही है। शहर के कई इलाकों में एयर क्वालिटी इंडेक्स (AQI) अनहेल्दी श्रेणी में पहुंच चुका है, जिसका सीधा असर आम नागरिकों, बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है।
रांची: हाल के दिनों में राजधानी रांची का AQI लगातार 150 से ऊपर बना हुआ है, जबकि कुछ क्षेत्रों में यह 180 के करीब दर्ज किया गया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो हालात और बिगड़ सकते हैं। इस चुनौती से निपटने के लिए प्रशासनिक सख्ती के साथ-साथ नागरिकों की जागरूकता भी बेहद जरूरी है।
IQAir और AQI.in के आंकड़ों के मुताबिक, रांची का औसत AQI 151–200 के बीच दर्ज किया गया है, जो अनहेल्दी श्रेणी में आता है। कोकर चौक, डोरंडा, हरमू और गांधी नगर जैसे इलाकों में प्रदूषण का स्तर खासा अधिक है। यहां PM2.5 और PM10 प्रमुख प्रदूषक बने हुए हैं, जो सर्दियों के मौसम में और ज्यादा खतरनाक हो जाते हैं।
आंकड़ों में प्रदूषण का असर
PM2.5 का स्तर 70 से 90 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक दर्ज किया जा रहा है, जबकि इसकी सुरक्षित सीमा 60 माइक्रोग्राम है। यह फेफड़ों में गहराई तक पहुंचकर अस्थमा, हृदय रोग और सांस की गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ाता है। वहीं PM10 का स्तर 100 से 120 माइक्रोग्राम तक पहुंच गया है, जिससे खांसी, आंखों में जलन और सांस लेने में परेशानी हो रही है। समग्र AQI 160–185 के बीच रहने से संवेदनशील वर्ग के लोगों के लिए जोखिम काफी बढ़ गया है।
दिलचस्प तथ्य यह है कि जब रांची का AQI 170 के पार है, उसी समय बेंगलुरु और चेन्नई जैसे बड़े शहरों की हवा अपेक्षाकृत साफ बनी हुई है। सोशल मीडिया पर भी लोग #RanchiPollutionCrisis जैसे हैशटैग के जरिए अपनी चिंता जाहिर कर रहे हैं और रांची का नाम प्रदूषित शहरों की सूची में ऊपर चढ़ता जा रहा है।
प्रदूषण बढ़ने के प्रमुख कारण
विशेषज्ञों के अनुसार, रांची में बढ़ते वायु प्रदूषण के पीछे कई कारण हैं। तेज शहरीकरण और हरित क्षेत्रों की कमी से प्राकृतिक संतुलन बिगड़ा है। वाहनों की संख्या में तेज बढ़ोतरी, खासकर पुरानी डीजल गाड़ियां और ट्रैफिक जाम, प्रदूषण को और बढ़ा रहे हैं।
इसके अलावा, निर्माण कार्यों से उड़ने वाली धूल पर नियंत्रण की कमी, सर्दियों में हवा की रफ्तार कम होना और तापमान इनवर्शन जैसी मौसमी स्थितियां प्रदूषकों को वातावरण में फंसा देती हैं। खुले में कूड़ा जलाना और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों से निकलने वाला धुआं भी स्थिति को और गंभीर बना रहा है।
विशेषज्ञों और आम लोगों की बढ़ती चिंता
पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. श्वेता कुमारी का कहना है कि बढ़ता PM2.5 स्तर फेफड़ों को स्थायी नुकसान पहुंचा सकता है। उन्होंने बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा मरीजों को बाहर निकलते समय N95 मास्क पहनने की सलाह दी है।
सोशल एक्टिविस्ट रंजना कुमारी के अनुसार, हरित क्षेत्र की लगातार कमी सबसे बड़ी समस्या है। उन्होंने बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और ई-वाहनों को बढ़ावा देने की जरूरत बताई। वहीं आम नागरिकों का कहना है कि पहले रांची की हवा काफी साफ थी, लेकिन अब सुबह-शाम धुंध छाई रहती है और बच्चों का बाहर खेलना मुश्किल हो गया है।
समाधान की दिशा में प्रयास
झारखंड स्टेट पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड ने क्लीन एयर प्लान को सख्ती से लागू करने की बात कही है। इसके तहत शहर में व्यापक वृक्षारोपण, इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण, ट्रैफिक प्रबंधन में सुधार और खुले में कचरा जलाने पर सख्त कार्रवाई की योजना है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि सरकार, प्रशासन और आम लोग मिलकर ठोस कदम उठाएं, तो आने वाले वर्षों में हालात में सुधार संभव है। नागरिकों से अपील की गई है कि वे अनावश्यक बाहर निकलने से बचें, मास्क का इस्तेमाल करें और स्वच्छ हवा के लिए जागरूकता फैलाएं। स्वच्छ हवा हर नागरिक का अधिकार है और इसे बचाने के लिए अब तत्काल कदम उठाने की जरूरत है।
