गिरिडीह: आमतौर पर गर्मियों में जल संकट देखने को मिलता है, लेकिन शहर से सटी पपरवाटांड दलित बस्ती के लोगों को सर्दियों में भी गंभीर पानी की किल्लत का सामना करना पड़ रहा है। यहां के लोग सालभर पानी के लिए संघर्ष करते हैं। कुछ परिवार चापाकल पर निर्भर हैं, कुछ नदी से पानी लाने को मजबूर हैं, जबकि कई परिवार ऐसे भी हैं जिन्हें पानी के लिए “पाताल” तक जाना पड़ता है।
सिरमोहन में उतरकर लाना पड़ता है पानी
यह “पाताल” दरअसल सीसीएल की बंद पड़ी अंडरग्राउंड माइंस से जुड़ी हवा की गैलरी है, जिसे स्थानीय लोग सिरमोहन कहते हैं। वर्षों पहले खदान बंद हो चुकी है, लेकिन यह गैलरी अब तक खुली हुई है। दलित बस्ती के बीच स्थित इस गैलरी में अंदर जाते ही पानी का स्रोत मिलता है। पानी की भारी कमी के कारण महिलाएं और बच्चे जान जोखिम में डालकर इसी गैलरी में उतरते हैं और वहां जमा पानी को बर्तनों में भरकर घर लाते हैं। मंगलवार को वार्ड सदस्य द्वारा सूचना दिए जाने के बाद ईटीवी भारत की टीम ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया।
बोरिंग और टंकी होने के बावजूद संकट बरकरार
स्थानीय झामुमो नेता जगत पासवान के अनुसार, बस्ती में पानी की समस्या वर्षों से बनी हुई है। सीसीएल की ओर से जलापूर्ति के लिए पाइपलाइन तो बिछाई गई, लेकिन उससे कभी पानी नहीं पहुंचा। एकल ग्रामीण जलापूर्ति योजना के तहत बोरिंग और पानी की टंकी तो लगाई गई, लेकिन न तो मोटर ठीक से लगाई गई और न ही नियमित आपूर्ति की व्यवस्था की गई। हालात यह हैं कि टंकी भरने में कभी एक तो कभी दो दिन लग जाते हैं और भरने के बाद भी केवल एक-दो घरों तक ही पानी पहुंच पाता है।
छठ के दौरान मिली थी अस्थायी राहत
वार्ड सदस्य पूनम देवी और झामुमो नेता जगत पासवान बताते हैं कि जल संकट को लेकर कई बार आंदोलन किए गए। गिरिडीह–डुमरी मुख्य मार्ग को जाम किया गया और लोग सीसीएल के जीएम कार्यालय तक पहुंचे। छठ पूजा के दौरान सीसीएल ने लगातार पांच दिनों तक रोज दो घंटे पानी की आपूर्ति की थी, लेकिन इसके बाद फिर सप्लाई बंद कर दी गई। पहले यहां रोजाना दो से तीन घंटे पानी मिलता था, लेकिन पिछले एक-दो वर्षों से आपूर्ति पूरी तरह ठप है।
आवेदन पर भी नहीं हुई सुनवाई
पपरवाटांड की दोनों दलित बस्तियों की स्थिति एक जैसी है। स्थानीय मुखिया शिवनाथ साव ने भी कई बार संबंधित विभागों और सीसीएल प्रबंधन को लिखित आवेदन दिया, लेकिन अब तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई है। पानी की समस्या जस की तस बनी हुई है और लोग मजबूरी में खतरनाक तरीकों से पानी जुटाने को विवश हैं।
