स्वामी विवेकानंद का देवघर प्रवास
देवघर, बाबा बैद्यनाथ की नगरी, स्वामी विवेकानंद के लिए कई बार यात्रा का केंद्र रहा। वे शिकागो धर्म सम्मेलन से पहले और लौटने के बाद यहां आए। पहली बार 1887 की गर्मियों में बीमार होने के कारण गुरु भाइयों के आग्रह पर स्वास्थ्य लाभ हेतु वे सिमुलतला और देवघर आए।
1899 में, शिकागो से लौटने के दो साल बाद, स्वामी जी ने फिर से देवघर आकर बाबा बैद्यनाथ की पूजा की। पंडा स्व. हरिचरण मिश्रा ने उन्हें दर्शन कराए। स्वामी विवेकानंद माता पार्वती मंदिर के चबूतरे पर घंटों बैठा करते थे और पंडा की पोथियों में अपने विचार लिखकर हस्ताक्षर भी किए। उनका हस्तलेख आज रामकृष्ण मिशन विद्यापीठ के म्यूजियम में संरक्षित है।
स्वामी जी का देवघर आगमन करीब छह-से-सात बार हुआ, मुख्यतः स्वास्थ्य लाभ या तीर्थयात्रा के उद्देश्य से। वे अधिकतर दिसंबर और जनवरी में आते थे। उनके प्रवास के दौरान उन्होंने पांच पत्र भी लिखे, जिनमें मित्रों से संवाद और स्वास्थ्य की जानकारी साझा की गई।
24 दिसंबर 1889 को वे पूर्ण बाबू की कोठी में रुके थे। मित्र बलराम बसु को लिखे पत्र में उन्होंने लिखा कि यहां के पानी में आयरन अधिक होने के कारण स्वास्थ्य ठीक नहीं है। 26 दिसंबर को मित्र प्रमदा दास को लिखा पत्र दर्शाता है कि वे कुछ दिन वाराणसी में रहने की इच्छा भी रखते थे।
तीन जनवरी 1898 को देवघर से मृणालिनी बसु को पत्र लिखा, जिसमें उन्होंने सामाजिक सुधारों जैसे बाल विवाह और विधवा विवाह पर विचार साझा किए। दिसंबर 1898 में ओलि बुल को लिखा पत्र उनके स्वास्थ्य लाभ हेतु देवघर आगमन का प्रमाण है।
1890 में वे भागलपुर होते हुए देवघर आए। यहां समाज सुधारक राजनारायण बोस से मुलाकात हुई और पुरानी तथा आधुनिक काल की घटनाओं पर चर्चा हुई।
स्वामी विवेकानंद के आदर्श आज भी रामकृष्ण मिशन विद्यापीठ, देवघर में जीवंत हैं। यह संस्थान उनके मानव और चरित्र निर्माण शिक्षा को आधार बनाकर दैनिक कार्यक्रम संचालित करता है, जिससे उनकी मैन-मैकिंग और कैरेक्टर बिल्डिंग की शिक्षाएं आज भी प्रासंगिक बनी हुई हैं।
