छतरपुर (मध्य प्रदेश): बुंदेलखंड क्षेत्र में केन-बेतवा लिंक परियोजना और अन्य सिंचाई परियोजनाओं के विरोध में पिछले 15 दिनों से चल रहा ग्रामीणों का अनिश्चितकालीन अनशन रविवार को तनावपूर्ण मोड़ पर पहुंच गया। प्रशासन और पुलिस बल ने मानसूनी बारिश और नदी के बढ़ते जलस्तर का हवाला देते हुए रविवार सुबह सभी प्रदर्शनकारियों को धरना स्थल से हटा दिया। हालांकि, आंदोलन के नेतृत्वकर्ता अमित भटनागर ने साफ कर दिया है कि उनका आमरण अनशन खत्म नहीं हुआ है और यह मांगें पूरी होने तक जारी रहेगा।
पुलिस पर बर्बरता का आरोप, नेता बोले- ‘चाहे जान चली जाए, पीछे नहीं हटेंगे’
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर ने प्रशासन पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन को कुचलने का गंभीर आरोप लगाया है। उन्होंने कहा, “पुलिस ने सुबह बर्बरतापूर्वक कार्रवाई की। महिलाओं के साथ धक्का-मुक्की और मारपीट की गई। हमारे द्वारा बनाए गए सांकेतिक फांसी के फंदे और चिताओं को तोड़ दिया गया। प्रशासन को अगर लगता है कि धरना स्थल से हटाने से मेरा अनशन टूट गया है, तो वे गलत हैं। अब चाहे मेरी जान ही क्यों न चली जाए, मैं अनशन नहीं तोड़ूँगा और सिर्फ नींबू-पानी पर अपना विरोध जारी रखूँगा।”
सियासत गरमाई: नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने सरकार को घेरा
इस कार्रवाई के बाद मध्य प्रदेश की सियासत भी गरमा गई है। विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने प्रदर्शनकारियों को जबरन हटाए जाने की कड़ी निंदा की। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य की भाजपा सरकार असहमति की हर आवाज को दबाना चाहती है। सिंघार ने कहा कि सरकार जनता के शांतिपूर्ण विरोध से डर रही है, इसलिए दमनकारी नीतियों का सहारा ले रही है।
प्रशासन का दावा: सुरक्षा के लिहाज से उठाया कदम
प्रदर्शनकारियों ने पहले अमित भटनागर को गिरफ्तार किए जाने की आशंका भी जताई थी, लेकिन प्रशासन ने इस दावे को खारिज कर दिया। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि लगातार हो रही बारिश और नदी के बढ़ते जलस्तर के कारण प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा दांव पर थी। इसलिए स्वास्थ्य और सुरक्षा कारणों को ध्यान में रखते हुए सभी ग्रामीणों को समझाइश देकर सम्मानपूर्वक उनके घरों तक पहुँचाया गया है।
क्यों हो रहा है यह आंदोलन?
गौरतलब है कि विस्थापित होने वाले परिवारों के पुनर्वास और मुआवजे से जुड़े वादे पूरे न होने से नाराज ग्रामीणों ने 3 जुलाई को कुपी गांव के पास बराना नदी के किनारे अनिश्चितकालीन अनशन शुरू किया था। ग्रामीणों का आरोप है कि परियोजना के कारण उनके घर और जमीनें तो छीनी जा रही हैं, लेकिन सरकार ने पुनर्वास को लेकर जो वादे किए थे, वे अब तक सिर्फ कागजों पर ही सिमटे हुए हैं।
