राजस्थान के जयपुर स्थित सवाई मानसिंह स्टेडियम में शुक्रवार, 26 दिसंबर को खेले गए विजय हजारे ट्रॉफी के मुकाबले में उत्तराखंड और मुंबई की टीमें आमने-सामने थीं। पहले बल्लेबाजी करते हुए मुंबई ने 330 रनों का विशाल स्कोर खड़ा किया। जवाब में 331 रनों के लक्ष्य का पीछा करने उतरी उत्तराखंड की टीम 280 रन ही बना सकी और मैच हार गई। हालांकि हार के बावजूद उत्तराखंड के तेज गेंदबाज देवेंद्र सिंह बोरा मैच के सबसे चर्चित खिलाड़ी बने रहे।
उत्तराखंड की ओर से पारी का पहला ओवर बागेश्वर निवासी राइट आर्म फास्ट बॉलर देवेंद्र सिंह बोरा ने डाला। देवेंद्र की पांचवीं गेंद पर मुंबई के अनुभवी बल्लेबाज रोहित शर्मा क्रीज पर आए। हल्की बाउंसर पर रोहित शर्मा गेंद को सही तरह से नहीं खेल सके और स्क्वायर लेग पर कैच देकर आउट हो गए।
ईटीवी भारत से बातचीत में देवेंद्र सिंह बोरा ने बताया कि उनका पिछला मैच काफी अच्छा रहा था, जिसमें उन्होंने चार विकेट चटकाए थे। शुक्रवार के मुकाबले में रोहित शर्मा के बल्लेबाजी के लिए आने पर उन्होंने पिच की उछाल को देखते हुए एक नई रणनीति अपनाई। उन्होंने स्क्वायर लेग और फाइन लेग के फील्डरों को थोड़ा पीछे लगाया, आउटस्विंग गेंदबाजी की और उछाल का फायदा उठाया, जिसके चलते रोहित शर्मा स्क्वायर लेग पर कैच दे बैठे।
देवेंद्र ने बताया कि वह कई वर्षों से क्रिकेट खेल रहे हैं और वर्ष 2019 से क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि कोच मनीष झा और एसोसिएशन के सचिव महिम वर्मा का उन्हें लगातार सहयोग मिलता रहा है, जिसकी वजह से वह अपने खेल में निरंतर सुधार कर पा रहे हैं। इससे पहले उन्होंने उत्तराखंड प्रीमियर लीग में देहरादून वॉरियर्स की ओर से भी मुकाबले खेले थे। हालांकि उस समय उन्हें बड़ी सफलता नहीं मिली, लेकिन धीरे-धीरे उनका प्रदर्शन बेहतर होता गया। इसी सीजन के रणजी ट्रॉफी मुकाबले में उन्होंने 6 विकेट लेने का भी कारनामा किया था।
बागेश्वर जिले की बागेश्वर तहसील के छतीना गांव से ताल्लुक रखने वाले देवेंद्र सिंह बोरा का जन्म एक साधारण परिवार में हुआ। उनकी शुरुआती पढ़ाई मंडल शेरा इंटर कॉलेज, बागेश्वर से हुई। उनके पिता बलवंत सिंह बोरा किसान हैं, जबकि मां नेमा देवी गृहिणी हैं। देवेंद्र का छोटा भाई संदीप बागेश्वर में एक निजी कंपनी में काम करता है।
देवेंद्र सिंह बोरा ने बताया कि उनके करियर की शुरुआत संघर्षों से भरी रही है। एक समय उन्होंने सूरत (गुजरात) में छह महीने तक एक ज्वेलरी शॉप में नौकरी भी की। बाद में बागेश्वर के उनके शुरुआती कोच हैरी कर्मयाल से उन्हें क्रिकेट के लिए प्रेरणा मिली, जिन्होंने उन्हें शुरुआती दौर में इस खेल के लिए तैयार किया और आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया।
