ग्वालियर: राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के 78 साल बाद भी उनके हत्यारे नाथूराम गोडसे को लेकर देश में विवाद थमता नजर नहीं आ रहा है। मध्य प्रदेश के ग्वालियर में मंगलवार (19 मई) को हिंदू महासभा द्वारा नाथूराम गोडसे की 116वीं जयंती मनाई गई। इस दौरान न सिर्फ गोडसे का महिमामंडन किया गया, बल्कि उसके समर्थन में जमकर नारेबाजी भी हुई। इस विवादित कार्यक्रम के बाद शहर में तनाव की स्थिति को देखते हुए स्थानीय प्रशासन पूरी तरह अलर्ट मोड पर है।
हिंदू महासभा दफ्तर में माल्यार्पण और नारेबाजी
जानकारी के मुताबिक, ग्वालियर के दौलतगंज स्थित हिंदू महासभा कार्यालय में मंगलवार को गोडसे की जयंती पर एक विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में संगठन के तमाम पदाधिकारी और कार्यकर्ता जुटे। कार्यकर्ताओं ने नाथूराम गोडसे की तस्वीर पर बकायदा माल्यार्पण किया और आरती उतारी। इस दौरान परिसर में “नाथूराम गोडसे अमर रहे” के विवादित नारे भी गूंजे, जिससे क्षेत्र में राजनीतिक और सामाजिक सरगर्मी बढ़ गई है।
“गांधी की हत्या नहीं, ‘वध’ किया था” – विवादित बयानों की बौछार
कार्यक्रम के दौरान हिंदू महासभा के नेताओं ने मंच से कई बेहद आपत्तिजनक और विवादित बयान दिए। संगठन के पदाधिकारियों ने महात्मा गांधी की हत्या का बचाव करते हुए कहा कि, “नाथूराम गोडसे ने गांधी जी की हत्या नहीं की थी, बल्कि देशहित में उनका ‘वध’ किया था।” इसके साथ ही हिंदू महासभा ने केंद्र सरकार से मांग की है कि देश के वीर सेनानियों की तरह नाथूराम गोडसे की मूर्तियां भी पूरे देश में स्थापित की जाएं।
वोट बैंक और गोडसे का महिमामंडन: > गौरतलब है कि ग्वालियर में गोडसे का महिमामंडन और उसकी पूजा का यह कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले भी हिंदू महासभा यहां गोडसे का मंदिर बनाने और ज्ञानशाला खोलने को लेकर विवादों में रह चुकी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पार्टियां और संगठन अपने खास वोट बैंक को साधने के लिए समय-समय पर इस तरह के संवेदनशील हथकंडे आजमाते रहते हैं।
इतिहास का वो काला दिन
इतिहास के पन्नों को पलटें तो 30 जनवरी 1948 की शाम करीब 5:15 बजे नाथूराम गोडसे ने नई दिल्ली के बिड़ला हाउस में प्रार्थना सभा के दौरान महात्मा गांधी के सीने पर गोलियां दागकर उनकी निर्मम हत्या कर दी थी। इस घटना के 78 साल गुजर जाने के बाद भी आज एक तरफ जहां पूरा देश गांधी को ‘राष्ट्रपिता’ के रूप में पूजता है, वहीं कुछ कट्टरपंथी संगठन उनके हत्यारे को ‘देशभक्त’ साबित करने की जिद पर अड़े हैं, जिससे कानून-व्यवस्था के लिए अक्सर चुनौती खड़ी हो जाती है।
