नई दिल्ली: देश में आवारा कुत्तों के बढ़ते आतंक और उनके हमलों से मासूमों की हो रही मौतों पर सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने एक बेहद अहम और बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अधिकारियों को सार्वजनिक सुरक्षा के मद्देनजर पागल, असाध्य रूप से बीमार और बेहद खतरनाक हो चुके आवारा कुत्तों को ‘इच्छामृत्यु’ (यूथेनेशिया) देने की अनुमति दे दी है। अदालत ने साफ किया है कि यह कदम इंसानी जिंदगी को बचाने के लिए जरूरी है, लेकिन यह पूरी प्रक्रिया कानूनी प्रोटोकॉल के तहत ही की जानी चाहिए।
तीन जजों की पीठ ने लिया स्वतः संज्ञान
देशभर में आवारा कुत्तों के खतरे को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया था। इस संवेदनशील मामले पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति एन.वी. अंजारिया की तीन सदस्यीय पीठ ने यह दिशा-निर्देश जारी किए।
कब और किन हालातों में दी जाएगी ‘इच्छामृत्यु’?
अदालत ने अपने आदेश में उन परिस्थितियों को स्पष्ट किया है, जिनमें प्रशासन ऐसे कड़े कदम उठा सकता है:
- चिंताजनक आबादी: जिन क्षेत्रों में आवारा कुत्तों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ गई है।
- लगातार हमले: जहां कुत्तों के काटने या आक्रामक हमलों की घटनाएं बार-बार हो रही हैं और जनता के लिए खतरा बनी हुई हैं।
- बीमारी और हिंसक व्यवहार: जो कुत्ते रेबीज से ग्रसित हैं, लाइलाज बीमारी से पीड़ित हैं या स्पष्ट रूप से इंसानों के लिए बेहद खतरनाक और हिंसक हो चुके हैं।
विशेषज्ञों की देखरेख में एक्शन: > कोर्ट ने सख्त हिदायत दी है कि यह कार्रवाई मनमाने ढंग से नहीं होगी। योग्य पशु चिकित्सा विशेषज्ञों (Veterinary Experts) द्वारा उचित मूल्यांकन के बाद ही ‘पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960’ और ‘पशु जन्म नियंत्रण नियम 2023’ के वैधानिक प्रोटोकॉल के तहत ही इच्छामृत्यु दी जा सकेगी।
“गरिमापूर्ण जीवन के अधिकार में कुत्तों के डर से मुक्ति भी शामिल”
पशु अधिकार कार्यकर्ताओं द्वारा आवारा कुत्तों के स्थानांतरण और नसबंदी संबंधी पूर्व आदेशों को वापस लेने की मांग वाली याचिकाओं को भी अदालत ने खारिज कर दिया। पीठ ने टिप्पणी करते हुए कहा कि संविधान द्वारा दिए गए ‘गरिमापूर्ण जीवन जीने के अधिकार’ (Right to Life) में नागरिकों का यह अधिकार भी शामिल है कि वे बिना किसी कुत्ते के काटने या हमले के डर के स्वतंत्र रूप से घूम सकें।
