बांका: विश्व प्रसिद्ध श्रावणी मेले के अवसर पर बांका जिले से गुजरने वाले 54 किलोमीटर लंबे कांवरिया पथ का रूप-रंग बीते दो दशकों में पूरी तरह बदल चुका है। कभी कंकड़-पत्थर, बीहड़ जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों से भरा रहने वाला यह मार्ग अब शिवभक्तों की सुगम और सुरक्षित यात्रा के लिए अत्याधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित है।
पेट्रोमैक्स के दौर से टेंट सिटी तक का सफर करीब 20 वर्ष पहले इस मार्ग पर सरकारी सुविधाएं न के बराबर हुआ करती थीं। रात में रोशनी का कोई स्थायी इंतजाम नहीं था; दुकानें पेट्रोमैक्स और जनरेटर के भरोसे चलती थीं। श्रद्धालु हाथ में टॉर्च थामे ‘बोल बम’ के जयघोष के साथ अंधेरा चीरते हुए बाबाधाम की ओर बढ़ते थे। जिलेबिया, सुईया और चांदन के घने जंगलों को शाम ढलने के बाद पार करना जोखिम भरा माना जाता था, जिससे बचने के लिए श्रद्धालु समूहों में यात्रा करते थे।
सुविधाओं से सुसज्जित हुआ 54 किमी का मार्ग समय के साथ बिहार सरकार और पर्यटन विभाग ने कांवड़िया पथ का व्यापक कायाकल्प किया। आज धौरी से लेकर झारखंड सीमा (दुम्मा) तक महीन बालू की कालीन बिछाई गई है ताकि नंगे पांव चलने वाले कांवरियों को राहत मिल सके। मार्ग में जगह-जगह शुद्ध पेयजल, शौचालय, स्नानागार, निर्बाध बिजली, स्वास्थ्य शिविर और सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए गए हैं। इसके अलावा पर्यटन विभाग की ओर से टेंट सिटी और सांस्कृतिक भक्ति जागरण का भी आयोजन किया जा रहा है।
दुकानों और सेवा शिविरों की संख्या में भारी बढ़ोतरी सुविधाएं बढ़ने के साथ ही इस पथ पर स्थानीय रोजगार और सेवा भावना का भी विस्तार हुआ है। जानकारों के मुताबिक, एक दशक पहले जहां 54 किलोमीटर के इस क्षेत्र में 5,000 दुकानें भी मुश्किल से लगती थीं, वहीं अब पूरे मार्ग पर हजारों की संख्या में दुकानें और निःशुल्क सेवा शिविर स्थापित हो चुके हैं, जो श्रद्धालुओं की सेवा में दिन-रात तत्पर रहते हैं।
