रांची: झारखंड उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को झटका देते हुए एक महत्वपूर्ण और नजीर पेश करने वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि केवल फर्जीवाड़े या गड़बड़ी का आरोप लगाकर किसी सेवानिवृत्त कर्मचारी की पेंशन, वेतन या सेवानिवृत्ति के लाभ नहीं रोके जा सकते। चीफ जस्टिस एम. एस. सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने एकल पीठ के फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि लगभग 36 साल पुराने अतिरिक्त वेतन की वसूली बिना विधिसम्मत प्रक्रिया के पूरी तरह अनुचित है।
मामला सेवानिवृत्त कर्मचारी तारकेश्वर प्रसाद सिंह से जुड़ा है, जिन्हें 2011 में निलंबित कर जांच के बाद मामूली दंड दिया गया था और वे 2013 में सेवानिवृत्त हो गए थे। अदालत ने झारखंड पेंशन नियम, 2000 के नियम 43(B) का हवाला देते हुए कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद वित्तीय वसूली या विभागीय कार्रवाई के लिए कानूनी प्रक्रिया और निर्धारित समय-सीमा का पालन अनिवार्य है। हालांकि, हाईकोर्ट ने आपराधिक एफआईआर दर्ज करने पर लगी रोक हटाते हुए कहा कि आपराधिक मामलों में किसी कर्मचारी को स्वतः सुरक्षा नहीं मिलती।
