नयी दिल्ली: बिहार में गंगा और उसकी सहायक नदियों में अशोधित अपशिष्ट (सीवेज) के बहाव पर राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने बेहद कड़ा रुख अपनाया है। NGT ने बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (BSPCB) को स्पष्ट निर्देश दिया है कि गंगा नदी को दूषित करने वाले शहरी स्थानीय निकायों पर तुरंत ‘पर्यावरणीय मुआवजा’ (Enviornmental Compensation) लगाया जाए।
हरित अधिकरण के अध्यक्ष न्यायमूर्ति प्रकाश श्रीवास्तव और विशेषज्ञ सदस्य अफरोज अहमद की पीठ ने एक प्रमुख समाचार पत्र की खबर का स्वतः संज्ञान लेते हुए यह फैसला सुनाया। खबर में बताया गया था कि बिहार में गंगा का पानी इतना प्रदूषित है कि यह नहाने योग्य भी नहीं बचा है।
अदालत के आदेश और मुख्य बिंदु:
- 27 जिलों की नदियों में खतरनाक स्थिति: अधिकरण बिहार के 27 जिलों में प्रवाहित होने वाली गंगा, सोन, कोसी और बागमती जैसी प्रमुख नदियों में ‘फिकल कोलीफ़ॉर्म’ (मल संबंधी जीवाणु) की अत्यधिक मौजूदगी और भारी प्रदूषण की जांच कर रहा है।
- STP की सुस्त चाल पर सवाल: राज्य सरकार द्वारा दिए गए हलफनामे के अनुसार बिहार में प्रस्तावित 43 अपशिष्ट शोधन संयंत्रों (STP) में से केवल 15 ही चालू स्थिति में हैं। NGT ने सरकार से इन एसटीपी की क्षमता और निर्माणाधीन परियोजनाओं की प्रगति रिपोर्ट मांगी है।
- गंगा में रोजाना गिरता करोड़ों लीटर सीवेज: हलफनामे में खुलासा हुआ कि राज्य के प्रमुख शहरों से प्रतिदिन भारी मात्रा में अशोधित पानी सीधे नदियों में बहाया जा रहा है:
- पटना: 15 नालों से रोजाना 34.9 करोड़ लीटर
- बक्सर: 7 नालों से 5 करोड़ लीटर
- आरा: 5 नालों से 4.7 करोड़ लीटर
- जमालपुर (मुंगेर): 5 नालों से 2.5 करोड़ लीटर
- बरौनी: 2 नालों से 2.3 करोड़ लीटर
NGT ने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से यह भी सुनिश्चित करने को कहा है कि चालू एसटीपी से निकलने वाला शोधित पानी तय पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप है या नहीं।
