नई दिल्ली/पटना: नेपाल में हुई मूसलाधार बारिश के बाद आई विनाशकारी बाढ़ का असर अब भारत के मैदानी इलाकों में भी दिखने लगा है। पड़ोसी देश नेपाल में नदियां उफान पर हैं, जिसके बाद बिहार और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है। स्थिति से निपटने के लिए एनडीआरएफ (NDRF) ने बिहार में 9 और उत्तर प्रदेश में 11 संवेदनशील टीमों को मुस्तैद कर दिया है। लेकिन इस बीच सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि आखिर पानी के गांव-शहरों में घुसने से पहले प्रशासन को यह कैसे पता चल जाता है कि कितना बड़ा खतरा आने वाला है?
दरअसल, बाढ़ की समय रहते सटीक चेतावनी देना सिर्फ नदी के जलस्तर को देखने तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एक अत्याधुनिक ‘फ्लड वार्निंग एंड मॉनिटरिंग सिस्टम’ (Flood Warning System) काम करता है, जो कई चरणों में खतरे का आकलन करता है:
- कैचमेंट एरिया और बारिश की निगरानी: बाढ़ की चेतावनी का पहला और सबसे अहम संकेत नदी के ऊपरी प्रवाह क्षेत्र (Catchment Area) यानी पहाड़ी इलाकों में होने वाली बारिश से मिलता है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) के अनुसार, उत्तर बिहार की गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला, कोसी और महानंदा जैसी प्रमुख नदियों का कैचमेंट एरिया नेपाल में है। जब नेपाल के पहाड़ों में भीषण बारिश होती है, तो उपग्रहों (Satellite Data) और वेदर रडार की मदद से पानी के मात्रा का अंदाजा लगाकर पहला अर्ली वार्निंग सिग्नल जारी कर दिया जाता है।
- बैराज और जलस्तर का रीयल-टाइम डेटा: पानी पहाड़ों से निकलकर जब मैदानी इलाकों के बैराजों (जैसे वाल्मीकिनगर या कोसी बैराज) तक पहुंचता है, तो वहां सेंसर और ऑटोमैटिक वॉटर लेवल गेज के जरिए डिस्चार्ज (क्यूसेक में पानी का बहाव) मापा जाता है। बैराज से छोड़े गए पानी की रफ्तार के आधार पर यह तय किया जाता है कि अगले 12 से 24 घंटों में निचले इलाकों में जलस्तर कितना ऊपर जाएगा।
- सुपरकंप्यूटर और हाइड्रोलॉजिकल मॉडलिंग: प्राप्त डेटा को कंप्यूटर मॉडल्स में फीड किया जाता है, जो यह सटीक अनुमान लगाते हैं कि नदी का पानी किस गति से आगे बढ़ेगा और किन-किन तटबंधों (Embankments) या गांवों को प्रभावित कर सकता है।
इसी आधुनिक अर्ली-वार्निंग नेटवर्क की बदौलत नेपाल से भारी पानी छोड़े जाने के बावजूद भारतीय प्रशासन को संवेदनशील इलाकों को खाली कराने और सुरक्षाबल तैनात करने का पर्याप्त समय मिल जाता है।
