प्रयागराज: न्याय प्रक्रिया को अधिक गरिमापूर्ण, संवेदनशील और पीड़ित-केंद्रित बनाने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। अब राज्य की अदालतों के फैसलों, कार्यशैली और पुलिस की एफआईआर (FIR) ड्राफ्टिंग में रूढ़िवादी व अपमानजनक शब्दों के इस्तेमाल पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है।
हाई कोर्ट ने इस गाइडलाइन का तत्काल प्रभाव से पालन सुनिश्चित करने के लिए सभी जिला एवं सत्र न्यायालयों, गृह विभाग, डीजीपी (DGP) और महिला एवं बाल विकास विभाग को निर्देश जारी कर दिए हैं। नए दिशा-निर्देशों के तहत अब संवेदनशील मामलों की सुनवाई बंद कमरे (In-camera) में होगी और गवाहों को पूरा सम्मान दिया जाएगा।
यह बदलाव इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक मामले में की गई आपत्तिजनक टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेने के बाद आया है। इसके लिए गठित उच्चस्तरीय कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर देशभर की अदालतों के लिए नई गाइडलाइन तय की गई है।
बदले गए प्रमुख शब्द:
- प्रॉसिक्यूट्रिक्स / बेबस औरत: अब इन्हें सर्वाइवर, विक्टिम या शिकायतकर्ता लिखा जाएगा।
- अस्मत या शील भंग करना: इसकी जगह शारीरिक स्वायत्तता का उल्लंघन या सेक्सुअल असॉल्ट शब्द का प्रयोग होगा।
- रखैल / कीप: अब इन्हें पार्टनर या महिला मित्र कहा जाएगा।
- वेश्या / कॉलगर्ल: इनके लिए सेक्स वर्कर शब्द का इस्तेमाल अनिवार्य होगा।
- चरित्रहीन: किसी भी महिला के लिए इस शब्द के बजाय केवल साक्ष्य और कानून पर केंद्रित संदर्भों का ही प्रयोग किया जाएगा।
