मोतिहारी: केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के सफल 12 साल पूरे होने पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) देश भर में ’12 साल बेमिसाल’ के नारे के साथ जश्न मना रही है। विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, उपलब्धियों के पोस्टर चमकाए जा रहे हैं और वीडियो चलाए जा रहे हैं। लेकिन इन सबके बीच, बिहार के पूर्वी चंपारण (मोतिहारी) के किसानों की आंखों में आज भी वही पुरानी मायूसी और एक अनुत्तरित सवाल जस का तस खड़ा है— आखिर हमारी बंद पड़ी चीनी मिलों का क्या हुआ?
वह ऐतिहासिक वादा और ‘चीनी वाली चाय’ का सपना
बात साल 2014 की है, जब देश में ‘मोदी लहर’ पर सवार होकर नरेंद्र मोदी मोतिहारी के ऐतिहासिक गांधी मैदान पहुंचे थे। चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने मंच से चंपारण के किसानों के दिलों को छूने वाला एक बड़ा वादा किया था। पीएम मोदी ने कहा था कि केंद्र में उनकी सरकार बनते ही मोतिहारी की बंद पड़ी चीनी मिलों को दोबारा चालू कराया जाएगा। उन्होंने बेहद भावुक अंदाज में कहा था— “अगली बार जब मैं मोतिहारी आऊंगा, तो यहीं की चीनी से बनी चाय पिऊंगा।”
आज इस वादे को बीते 12 साल हो चुके हैं। दिल्ली की सत्ता में मोदी सरकार ने एक नहीं, बल्कि लगातार तीन कार्यकाल (ट्रिपल टर्म) पूरे कर लिए हैं। प्रधानमंत्री कई बार मोतिहारी के दौरे पर भी आए, लेकिन न तो बंद चीनी मिलों के ताले खुले, न किसानों के खेतों में गन्ने की खोई हुई मिठास लौटी और न ही मोतिहारी की चीनी वाली चाय का वह सपना सच हो सका।
खंडहर में तब्दील हुईं चंपारण की लाइफलाइन
कभी चंपारण की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाने वाली चकिया और हनुमान शुगर मिल आज अपनी बदहाली के आंसू रो रही हैं। जिन मिलों की चिमनियों से कभी धुंआ निकलता था और हजारों परिवारों का चूल्हा जलता था, वे अब पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं।
जमीनें बिकीं, मशीनें हुईं कबाड़: स्थानीय सूत्रों के हवाले से जो खबरें आ रही हैं, वे और भी चौंकाने वाली हैं। मिल परिसरों की एक बड़ी हिस्सेदारी वाली कीमती जमीनें धीरे-धीरे बिक चुकी हैं, करोड़ों की मशीनें जंग खाकर कबाड़ बन चुकी हैं और मिल के आसपास अब रिहायशी आबादी बस चुकी है। साफ है कि जिस उद्योग को पुनर्जीवित करने का ख्वाब दिखाया गया था, वह अब इतिहास के पन्नों में दफन होने की कगार पर है।
हर चुनाव में याद आती है मिल, फिर मुद्दा गायब
विडंबना यह है कि मोतिहारी की चीनी मिल अब सिर्फ एक ‘सीजनल चुनावी एजेंडा’ बनकर रह गई है। लोकसभा हो या विधानसभा चुनाव, हर बार राजनीतिक दलों के नेताओं को वोट बटोरने के लिए चीनी मिल की याद आ जाती है। मंचों से किसानों के हक में लंबे-चौड़े और भावुक भाषण दिए जाते हैं, रोजगार और स्थानीय स्तर पर उद्योग लगाने की कसमें खाई जाती हैं। लेकिन, जैसे ही ईवीएम का बटन दबता है और चुनाव के नतीजे आते हैं, यह मुद्दा पोस्टरों और भाषणों के साथ ही हवा हो जाता है।
